शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

दाढ़ी बढ़ाना कट्टरपंथ नहीं लेकिन दाढ़ी के पीछे की जेहनियत कट्टरपंथ हो सकती है


जुनैद जमशेद पर लिखी गई मेरी एक टिप्पणी पर कई मुस्लिम भाइयों के कमेंट आए। इन सभी का कहना था कि संगीत छोड़ कर कोई खुदा की इबादत करे तो उसे कट्टरपंथी क्यूं कहा जाए? सचमुच जुनैद की कोई गलती नहीं थी असली गुनहगार तो वो हैं जो मजहब को गलत तरीके से पेश कर युवाओं का दिमाग खराब कर देते हैं। मेरी टिप्पणी पर जो मुस्लिम भाई कुछ नाराज दिखाई पड़े उनके सवालों के भी मैंने जवाब दिए। वो जुनैद को सिर्फ दाढ़ी तक सीमित मानकर चल रहे थे। ऐसे में जुनैद जमशेद की कहानी को इन सवालों और उनके जवाबों में समझना बहुत जरूरी है। ये इसीलिए जरूरी है ताकि कट्टरपंथियों के हाथों की कठपुतली बनकर कोई और जुनैद संगीत को हराम कहकर उन्मादी बातें न करने लगे। दाढ़ी तो हर धर्म का हिस्सा ऐसे में किसी के सिर्फ दाढ़ी भर रख लेने से कोई कट्टर नहीं हो जाता है। असली आफत है उस दाढ़ी को बढ़ाने के पीछे छिपी सोच। पहले मेरी फेसबुक पर की गई टिप्पणी को जस का तस लिख रहा हूं। दरअसल पाकिस्तान में हुए प्लेन क्रेश के बाद जुनैद के बारे में जाना और फिर दिलचस्पी बढ़ गई। उसकी जिंदगी ठीक वैसी थी जैसी पाकिस्तानी फिल्म खुदा के लिए में एक सिंगर की दिखाई गई थी, जो अपना संगीत छोड़कर एक तालीबान आतंकी बन जाता है। बांग्लादेश में हाल में हुए आतंकी हमले के एक आतंकवादी की भी ऐसी ही कहानी थी।
जुनैद जमशेद
मेरी टिप्पणी कुछ यूं थी...
पाकिस्तान के प्लेन क्रैश में मारे गए 47 लोगों में एक जुनैद जमशेद थे... अच्छा खासा सिंगर कट्टर पंथी हो गया था... अभी पढ़ा उसके बारे में तो जाना कि जिस जमाने में लोग पॉप समझ रहे थे वो स्टार बन गया था.. कट्टरपंथी सोच कैसे अच्छे खासे लोगों को खतरनाक बना देती है कि कहानी था जुनैद.. भारतीय श्रोताओं के लिए एक मजेदार चीज भी जानने को मिली... जुनैद ने अपने बैंड VitalSigns के जरिए एक गाना सांवली सलोनी सी महबूबा गाया था.. भारतीय श्रोताओं ने इसे.. 1994 की फिल्म हम सब चोर हैं.. में सुना.. इस गाने को भी चुरा के .. सांवली सलोनी तेरी झील सी आंखे .. बना दिया गया था.. जुनैद कलाकार था और हम कला प्रेमी है ..
जुनैद और अन्य 46 लोगों को श्रद्धांजलि के साथ 1991 का उसका ये गाना मैंने अपनी फेसबुक वॉल पर पोस्ट किया था। इस पर कई मुस्लिम भाइयों की टिप्पणी आई कि सिर्फ दाढ़ी की वजह से जुनैद को कट्टर नहीं कहना चाहिए। और भी कई टिप्णियां आईं जिनमें मेरे एक भाई अफी कुरैशी ने लिखा- डॉ. साब आपने जो रिसर्च की उसे जानकर अच्छा लगा लेकिन आपको एक जानकारी दे दूं। भगवान, अल्लाह, गॉड, वाहेगुरु के लिए गलत बंदों को नेक राह पर लाना, अमन कायम करना, झगड़ों से, शराब से, जुआ से, चोरी से, डकैती से हर उस गलत काम से रोकना जिसे समाज में बुरा समझा जाता हो, उसे कट्टरपंथी नहीं कहते भाई.. उसे सदक ए जरिया कहते हैं। प्लीज रिसर्च सही करो और कट्टरपंथी और भलाई में फर्क ढूंढों...
इस बात में मुझे कुछ भी गलत नहीं लगा और आमतौर पर मैं रिसर्च पूरी करके ही लिखता हूं। इस मामले में भी मैंने काफी पढ़ा था लेकिन ज्यादा लिखने का मन नहीं किया। मैंने जवाब में लिखा भी कि मैं एक मृतात्मा और वो भी अच्छे कलाकार के बारे में कोई गड़े मुर्दे नहीं उखाड़ना चाहता। सच तो ये था कि जितने लोग मुझ से इस मसले पर बहस कर रहे थे वो खुद ही जुनैद की कहानी नहीं जानते थे। मैंने ऐसी कई खबरों के लिंक पेस्ट किए जहां जुनैद के खिलाफ पाकिस्तान में ही मामला दर्ज किया गया था लेकिन जुनैद के बारे में उनके एक पुराने जानकार और साथी की टिप्पणी सबसे अहम है। दरअसल इसमें अच्छे खासे युवाओं के ब्रेन वॉश का दर्द छिपा हुआ है। ये टिप्पणी पाकिस्तान के मशहूर फिल्मकार और संगीतकार शोएब मंसूर की थी। हिंदी में ये टिप्पणी कुछ इस तरह होगी...
शोएब मंसूर, 2007- आम सुबह की तरह मैं अखबार पढ़ रहा था इसमें मैंने अपने दोस्त जुनैद जमशेद का इंटरव्यू देखा। उसकी वेशभूषा और तस्वीर देखने के बाद मैं इस इंटरव्यू को पढ़ने से खुद को नहीं रोक पाया। जैसे जैसे मैं पढ़ता गया वैसे वैसे और दुखी होता गया। उसने कहा था कि वो म्यूजिक इसीलिए छोड़ चुका है क्यूंकि ये हराम है। मैं भौंचक्का रह गया। कोई ये कैसे विश्वास कर सकता है कि खुदा की इंसानों को दी गईं दो बड़ी नैमतें.. संगीत और पेंटिंग कभी भी हराम हो सकती हैं। मुझे अहसास हुआ कि जुनैद जैसे भटके हुए लोगों को कोई हक नहीं है कि वो ऐसे ही भटके हुए हजारों युवाओं को दिशा दिखाने का काम करें। मैंने उसे अपने जीवन के अहम 16 साल उसे दिए थे। मुझे आश्चर्य था कि वो ऐसे कैसे इन 16 सालों के साथ को एक तरफ फेंक सकता है वो भी मुझसे बिना सलाह मशविरा किए? मुझे लगा कि ये मेरी जिम्मेदारी है कि समाज को ऐसे कट्टरपंथियों के जरिए हो रहे नुकसान से बचाया जाए।
शोएब की कही हुई बातें कई जागरूक मुस्लिम विचारक कहते रहे हैं इसके बावजूद वो समाज में आने वाले इस खतरनाक बदलाव को नहीं रोक पाते हैं। जुनैद के प्रति उसे न जानने वालों की अंधभक्ति ये बताती है कि ये बात इस्लाम की नहीं है बल्कि इस्लाम के नाम पर भटके हुए युवाओं में और भटकाव पैदा करने की है। मेरे मुस्लिम मित्र ने फिर पूछा कि मैंने भी दाढ़ी रख ली है तो क्या मुझे भी कट्टरपंथी कहेंगे। मेरा जवाब था बिलकुल नहीं इस मुद्दे का दाढ़ी से कोई लेना देना है ही नहीं। असली वजह है जेहनियत। हमें जेहनियत पर बहस करनी चाहिए दाढ़ी या चोगे पर नहीं। ये बात सिर्फ जुनैद जमशेद की नहीं है ये बात हर उस युवा की है जो मजहब के नाम पर भटकाव की राह पकड़ रहा है। कट्टरपंथियों का मकसद ही होता है ऐसे लोगों को भ्रमित करना जिन्हें दूसरे युवा अपना रोल मॉडल मानते हैं। फिर इनके प्रभाव में आकर कई और युवा भी दाढ़ी बढ़ा लेते हैं। पाकिस्तान के कई क्रिकेटर्स आपको इसी रूप में मिलेंगे। इंजमाम वर्ल्ड कप के दौरान एक सीरिज में कई दिनों तक मेरे साथ एक्सपर्ट के रूप में बैठे। मेरी उनसे अच्छी मित्रता हो गई थी लेकिन मुझे एहसास हुआ कि कई मुद्दों पर उनका एक जकड़ा हुआ रूप भी है। यही वजह है कि वो अपने लोगों के लिए या अपने देश के उन युवाओं के लिए जो उन्हें अपना रोल मॉडल मानते हैं के लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं। युवा जाकिर नाइक जैसे भड़काऊ भाषण देने वालों पर ज्यादा भरोसा करते हैं जबकि इस्लाम के कई जानकार खुद ही ऐसे लोगों को खतरनाक करार देते रहे हैं। जब जुनैद की कहानी लिख रहा था तो नुसरत साहब की कव्वालियां भी सुन रहा था। आम तौर पर लिखते हुए उन्हें सुनना बहुत सुकून देता है। उन्हें सुनते हुए ये ख्याल भी आ रहा था कि किसी जेहनियत के चक्कर में फंसकर वो भी दाढ़ी बड़ा लेते तो ये खूबसूरत यादें कभी न मिल पातीं।




सोमवार, 28 नवंबर 2016

नोट बंद के खिलाफ कम, भारत बंद के खिलाफ ज्यादा जनाक्रोश दिखा!

प्रधानमंत्री मोदी के एक फैसले ने पूरे विपक्ष को लाम बंद कर दिया। विपक्ष की समस्या ये है कि उन्हें किसी भी कीमत पर विरोध करना है। इस समय पर यदि नोट बंदी के खिलाफ खड़े होते हैं तो काले धन और भ्रष्टाचार के साथ खड़े दिखाई देते हैं। इसी दुविधा से बचने के लिए जनता को होने वाली परेशानियों को ढाल बनाया गया। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है कि तर्ज पर सारे के सारे एक ही पाले में आकर खड़े भी हो गए लेकिन इससे विपक्ष की दुविधा कम होने के बजाय बढ़ी ही है।

नीतीश कुमार जैसे धुर विरोधी ने पहले ही नोट बंदी का समर्थन कर विपक्ष को कमजोर कर दिया था अब मायावती ने भी भारत बंद से खुद को बाहर रखकर ये साबित कर दिया कि उन्हें विपक्ष के एक जुट होने से ज्यादा अपनी राजनीति बचाने की जरूरत है। बीएसपी नोट बंदी के तो खिलाफ है लेकिन भारत बंद के साथ नहीं दिखी। इसी तरह विपक्ष के अलग अलग धड़ों ने अपने अपने तरीके से भारत बंद का समर्थन किया लेकिन उसके साथ खुलकर नहीं आए। यही वजह रही कि भारत बंद कामयाब नहीं हो पाया, बेशक ट्विटर और फेसबुक पर इस बंद पर बनने वाले जोक्स जमकर ट्रैंड करते रहे।

समाजवादी पार्टी ने तो लोगों को कन्फ्यूज करने की हदें पार कर दी। कौन किसके साथ है और किसके खिलाफ है ये जब पार्टी के भीतर ही साफ नहीं है तो सड़क पर क्या खाक साफ होगा। अमर सिंह ने रामगोपाल की वापसी से नाराज होकर कहा या वो सचमुच मोदी जी के प्रशंसक है कहना मुश्किल है लेकिन जिनके कंधों पर मुलायम सिंह ने अपना राजनैतिक भविष्य रखा है वो खुद भी नोट बंदी की प्रशंसा कर रहे हैं। नोट बंदी से किसे नुकसान हुआ है और किसे फायदा ये तो अलग आकलन का विषय है लेकिन विपक्ष ने जिस तरीके से इस मुद्दे पर अपना विरोध दिखाया है उसने उसे फायदा पहुंचाने के बजाय नुकसान ही पहुंचाया है।

चुनावी मौसम में विपक्ष को एक मुद्दा चाहिए था लेकिन वो मुद्दा यदि भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ उठाए गए किसी कदम को बनाया जाए तो आफत दोहरी होती है। केजरीवाल की राजनीति ही विरोध की ही रही सो उन्होंने ने तो फैसले के बाद से ही गाल बजाने शुरू कर दिए थे लेकिन हमेशा की तरह कांग्रेस एक बार फिर केजरीवाल का पल्लू पकड़े पकड़े पीछे चलने लगी है। कांग्रेस की ये एक बड़ी कमजोरी बनती जा रही है कि उसे ना चाहते हुए भी केजरीवाल के उठाए मुद्दों के पीछे भागना पड़ता है वो भी उनके बाद।

खैर भारत बंद बुलाया भी गया लेकिन या तो कार्यकर्ताओं की कमी कहिए या फिर विपक्ष का बिखराव कहिए इसका असर देखने को नहीं मिला। कई लोगों ने तो यहां तक कहा कि पहली बार ऐसा भारत बंद रहा कि भारत को ही पता नहीं चला। कुछ लोगों ने लिखा कि मैट्रो और बसें आम दिनों के मुकाबले ज्यादा खचाखच भरी दिखाई पड़ रही थी मानों वो लोग जो आम तौर पर ऑफिस न जाते हो वो भी आज जरूर जाना चाह रहे थे। सचमुच में ये आक्रोश दिवस नोट के खिलाफ कम भारत बंद के खिलाफ ज्यादा दिखाई पड़ता है।

बात ये नहीं कि सभी लोग नोट बंदी के समर्थन में आ गए हैं लेकिन ये जरूर है कि वो समझ गए हैं कि विपक्ष कि मंशा सिर्फ राजनैतिक लाभ लेने की है। लोग चाहते हैं कि यदि कोई कदम उठाया गया है तो उसे थोड़ा समय दिया जाना चाहिए। बैंक और एटीम के बाहर लगने वाली लाइनों की वजह भी अब किसी से छिपी नहीं है। जिन लोगों के पास डेबिट कार्ड होता है उन्हें रोज रोज लाइन में लगने की जरूरत नहीं पड़ती लेकिन कई लोग तो लगातार लाइनों में ही लगे रहने के लिए बैंकों और एटीएम के बाहर खड़े रहे। काले धन वालों ने सफेद करवाने के हथकंडे तो बहुत अपनाए लेकिन विश्वास करिए जितना काला धन पड़ा है वो कभी सफेद नहीं किया जा सकता। जो लोग तिकड़म भी लड़ा रहे हैं वो खुद को बेपर्दा ही कर रहे हैं।

अब बात आती है भ्रष्टाचार रोकने की। इसमें कोई दो राय नहीं कि सिर्फ नोट की शक्ल फितरत को नहीं बदल सकती। जो 500 और 1000 में रिश्वत लेते हैं वो 2000 में भी लेंगे लेकिन अहम सवाल ये है कि क्या ऐसे लोगों ने अभी तक जो कुछ किया है उस पर भी परदा पड़ा रहने दें? यही सवाल है जिसका जवाब लोगों को परेशानी के बावजूद मोदी के फैसले के साथ खड़ा दिखाता है। आप लोगों से पूछेंगे तो वो जवाब में अपनी परेशानी तो बताएंगे लेकिन साथ ही ये भी कहेंगे कि उम्मीद है इस पहल से कुछ सकारात्मक बदलाव होंगे। इतने बड़े कदम को उठाने के बाद दिक्कतें तो आती हैं लेकिन क्या उसके परिणामों के लिए कुछ समय इंतजार करने की जरूरत नहीं है? क्या विपक्ष भारत बंद जैसी तरकीबों से इस सुधार में खुद को बड़ी अड़चन नहीं बता रहा है? ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि इस कदम के क्या परिणाम आते हैं लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि बौखलाया हुआ विपक्ष इसका इंतजार नहीं करना चाहता।